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The thrill of the chase

By Peter Roebuck

Brian Lara’s unbeaten 153 against the Australians in Bridgetown is widely and justifiably regarded as the greatest chasing innings Test cricket has known. Throughout this epic performance Lara knew he could not afford to make a single misztake. Throughout, the Australians fought for his wicket like mongrels over a bone but Lara refused to oblige. Instead he constructed a masterpiece of batting that turned impending defeat into sudden and unexpected victory.

The innings is illuminated by its context. Before the series began, Lara had been as close to disgrace as any cricketer can be who has not offended a steward at Lord’s. West Indies had lost heavily in South Africa, hardly putting up a fight. Then they were trounced by Australia in the first match of this series. Lara appeared incapable of stopping the slide. At last he responded by scoring 213 in Jamaica, an innings that caught the Australians off guard and allowed the hosts to square the series. It was the start of an astonishing sequence of innings from Lara. His range was extraordinary, like an actor who had played drama, tragedy and comedy in successive performances and triumphed in them all.

Australia dominated the opening three days of the Third Test. Steve Waugh set the tone with a rugged 199 as Australia scored 490. West Indies subsided to 98 for 6 before the fightback began with a partnership of 153 between Sherwin Campbell and Ridley Jacobs.

Next day, West Indies continued their resurgence by bowling the Australians out for 146, leaving a target of 308 for victory. When three early wickets fell that fourth evening, it seemed the cause was lost. Overnight Lara was two not out.

West Indies’ position continued to deteriorate on Day Five till they were 105 for 5. Now Lara made his move, slipping through the gears, pressing hard upon the accelerator, taking the corners as fast as he dared and hoping that colleagues could survive in his slipstream. Jimmy Adams obliged, defending obdurately as the score mounted. Meanwhile, the ground was filling as news spread that West Indies were putting up a fight and that Lara was still batting.

Gradually the tension mounted and the noise rose as spectators lived and died with every ball. West Indies suffered further setbacks and Curtly Ambrose arrived at the crease with 60 runs needed and only two wickets left. Ambrose rose to the occasion, defending doggedly for 82 minutes. Meanwhile Lara drove and swept and pulled and calculated, a vibrant figure, a flashing blade and a ticking brain.

Australia surged again, fighting to save the day. Lara edged and his head recoiled in relief as the ball eluded Ian Healy’s gloves. Ambrose fell and Courtney Walsh appeared, a lanky, improbable figure and not at all a reassuring sight for thousands of supporters, let alone an exhausted captain needing a further seven runs for victory – so near and so very far away! Somehow Walsh kept out a searing inswinging yorker, the ball of the series, and then the Australians must have suspected the game was up. A wide followed, and a no-ball as the bowlers strained mind and muscle. Walsh endured, Lara took strike and smashed the winning runs through cover. Only in this moment of victory did he show any emotion, not that he had much choice as team-mates hugged him. As Wisden put it, he had “guided his team to victory as though leading the infirm through a maze”.

Former Somerset captain Peter Roebuck is a leading cricket writer

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An Open letter from an intellectual to all his interns

दोस्तों, अजीजों एवं प्यारे प्यारे भतीजों, इंसानियत का दुश्मन मोदी देश को आगे ले जाने का प्रयास कर रहा है, हमलोगों ने देश की तरक्की में पलीता लगाने के लिए जो कुर्बानियां दी थीं, वो जाया होती दिखाई दे रही हैं, लेकिन हम हार नहीं मानेंगे, हमारे प्रौढ़ साथी राजदीप ने एक वाट्सऐप मैसेज में कहा है कि मोदी ने GST लाकर एक देश एक टैक्स की दिशा में जो कदम उठाए हैं, उसके विरोध में अब हम हल्ला बोलेंगे, उनका संदेश है कि कोई भी कौमी-कांग्रेसी किसी भी दुकान से ऐसा कोई सामान नहीं खरीदेगा जिसपर GST लगा हो, कोई भी कौमी- कांग्रेसी GST की रिटर्न नहीं भरेगा. यहाँ तक कि जिन साथियों ने आधार और पैन लिंक करा दिए हैं वो इन दोनों चीजों को आग लगा कर इस लिबरल क्रांति को ऊर्जा दें. 

इस असहयोग आंदोलन से ईर्ष्या के कारण अगर कोई राह से भटका हुआ सरकारी कर्मचारी हम पर जुर्माने के लिए दबाव डालता है, तो पर हम उसे पहले Scroll और Wire जैसी वेबसाइट्स के एक एक आर्टिकल पढ़ने को देंगे. यदि उसके बाद भी उसके ब्रेन में सेल्स बचे रहते हैं और वो लिब्रलिज़्म की दीक्षा लेने से इनकार कर देता है, तो आखिरी चारे के रूप में हर लिबरल, ऋषि विश्वामित्र का यज्ञ भंग करने का प्रयास करने वाली अप्सरा मेनका का रूप धर लेगा और उसे वो थ्री इडियट वाला तोहफा क़ुबूल करने को मजबूर कर देगा, कुछ भी हो जाये न हम टैक्स देंगे लेंगे और न ही रिटर्न भरेंगे, क्योंकि आसमानी किताब में कहीं भी ऐसा करने का जिक्र नहीं है. हमारा फिदायीन दस्ता देश की वाट लगाने को एकदम तैयार है.

जीवे जीवे लिबरलिस्तान

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“आखिर क्यों रवीश कुमार जी फ़िल्म क्रिटिक नहीं बने”

रवीश कुमार जी अक्सर फिल्मों के बारे में बात करते नहीं पाए जाते, जब तक कि किसी फिल्म स्टार का कोई स्कैंडल प्रचारित करना भारत एनडीटीवी विदेश संबंधों के लिए क्रूशियल न हो जाए. रवीश जी मुल्क के सबसे ग्लैमरस पत्रकार है. उनका ग्लैमर आमिर शाहरुख की तरह स्क्रिप्ट, मेकअप और फेसलिफ्ट का मोहताज नहीं है, वो सलमान हैं. बिंदास सुल्तान. जो कर दें वही पत्रकारिता. जो लिख दें वही प्रेमगीत.

काफी दिन पहले देव आनंद साहब का एक डुप्लीकेट हुआ करता था, किशोर भानुशाली. रवीश जी ने अपना गेटअप उसी पर मोल्ड किया है कि किशोर भानुशाली अगर चालीस दिन तक बाल डाई न करे तो कैसा दिखेगा.

  खैर ये सब उतना महत्वपूर्ण नहीं है. बात हो रही थी फिल्मों से रवीश जी की अरुचि की. बीस पच्चीस साल पहले जब रवीश जी स्ट्रगलर पत्रकार थे और लालू प्रसाद यादव के छोटे मंत्री लड़के की तरह जवान थे, तो वो उस जमाने के रंगीन अखबार पंजाब केसरी में फिल्मी खबरें लिखा करते थे. एक बार वो  कभी हाँ, कभी न फिल्म देखने गए. वो तो है अलबेला, हजारों में अकेला गाना था जिसमें. शाहरूख खान हीरो. 

रवीश जी फिल्म से बहुत प्रभावित थे, उन्होंने समीक्षा में लिखा कि यदि मैंने कभी फिल्म बनाई तो मैं नई नहीं बनाउंगा, इसी को रीमेक कर लूंगा. उस समय अयोध्या में दिसम्बर बानवे होके चुका था और मुंबई विस्फोटों की प्लानिंग चल रही थी. मतलब भारत नाजुक दौर से गुजर रहा था. तबतक एनडीटीवी को अलग देश के रुप में मान्यता नहीं मिली थी और रवीश जी भारत के ही नागरिक थे. 

रवीश जी आगे लिखते हैं कि फिल्म कभी हाँ कभी न सेकुलरिज़म की एक टेक्स्ट बुक है. इसमें एक मुसलमान लड़के ने हिंदू का रोल किया है और एक हिंदू लड़के ने ईसाई का, और दोनों मिलकर एक ईसाई लड़की से प्यार करते हैं जिसका रोल एक कट्टर द्रविड़ परिवार की लड़की ने किया है और जिसका असली जिंदगी में एक बाप की उमर के पंजाबी से प्रेम प्रसंग चल रहा है. 

इतना ही नहीं, फिल्म में हीरो की शक्ल अपने पिता की बजाय चर्च के पादरी से ज्यादा मिलती है. कुल मिलाकर यह फिल्म सिनेमा के सामाजिक सरोकारों को स्थापित करती है, और विभिन्न धर्मों के बीच मिक्स वेजीटेबल रिश्तों की वकालत करती है.

महीना भर पहले जिन लोगों ने अयोध्या में देश की सेकुलर छवि को ढहा दिया, उनको कुर्सी से बांध कर यह फिल्म दिखाई जानी चाहिए. ताकि देश में कन्फ्यूज किस्म का एकतरफा सेकुलरिज़्म बना रहे. गाने अच्छे हैं, इन्हें आप महफिल में गा सकते हैं, एक गाना कुमार सानू ने मोहम्मद रफी की आवाज में गाया है उसे गाकर आप लड़की भी छेड़ सकते हैं. सिनेमेटोग्राफी साधारण है मगर हीरोइन का मेकअप जिसने किया है, वो जरूर फासीवादी सोच का आर्य आक्रमण कारी मूल का आदमी रहा होगा, जिसने एक सुंदर दक्षिण भारतीय द्रविड़ मूलनिवासी कन्या को बदसूरत दिखाया. 

वैसे आखिरी बीस मिनट को को सेंसर वालों से कटवा देना चाहिए था. फिल्म क्लाईमेक्स तक बहुत अच्छी है मगर निर्देशक अंत में संघ परिवार के दबाव में आ गया, माधव राव गोलवरकर और हेडगेवार के रक्त शुद्धता सिद्धांत के आगे रचनात्मकता टें बोल गई और अंत में ईसाई लड़की की शादी ईसाई दीपक तिजोरी से ही हुई. यहाँ तक कि अंत में हीरो को एक रिफ्यूजी पंजाबी चावला परिवार की लड़की से जबरिया सेट करा दिया गया. फिल्म को मेरी तरफ से पाँच तारा और एक चाँद भी.

बदकिस्मती से फिल्म फ्लॉप हो गई और इसका ठीकरा इस समीक्षा पर फूटा. रवीश जी ने आहत होकर पंजाब केसरी की नौकरी छोड़ दी. असल में वो अखबार था ही नहीं उनके लायक. उन्होंने कसम खाई कि आगे से फिल्मों के चक्कर में नहीं पड़ेंगे. काम की चीज़ सीखेंगे. फिर वो दस पंद्रह साल के लिए गायब हो गए. उनके इन सालों के बारे में किसी को कुछ ज्ञात नहीं है, लेकिन जब वो लौटे तो छा गए. 

रवीश जी आज बहुत बड़े स्टार हैं, उनकी क्रेडिबिलिटी आमिर शाहरुख से बहुत ज्यादा है. फिल्मी सितारों से चिपकने की उन्हें जरूरत भी नहीं है. इसलिए वो अपने कॉमेडी शो पर नई फिल्मों का प्रचार तक नहीं होने देते. बस बीच में दो एक मौके आए थे जब भारत पर दबाव बनाने के लिए आमिर शाहरुख के वाहियात बयानों पर प्रोग्राम चलाया गया था, मगर वो उनकी नौकरी की मजबूरी थी, वो एनडीटीवी गणराज्य के भारत में राजदूत जो ठहरे.

Via- Vikas Agrawal (@Vikasagrawal81)

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Government decides to subsidize burnol, Adarsh Liberal calls the PM a “Burnol Agent”.

प्रधानमंत्री ने की “Burnol” पर सब्सिडी देने की घोषणा, आदर्श लिबरल समुदाय ने बताया बर्नोल का एजेंट, सरकार ने कहा इन्क्लूसिव राजनीति.”

समाज में सभी वर्गों में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए “सबका साथ सबका विकास” के एजेंडे के तहत प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लांच की एक बम्पर योजना, ताजा समाचारों के अनुसार भारत सरकार “जलन-तपन- सुलगन” इत्यादि में राहत देने वाली क्रीम बर्नोल पर सब्सिडी देने जा रही है, “डायरेक्ट बेनिफिट्स ट्रान्सफर (DBT)” वाली नीति के तहत गैस सब्सिडी की तरह ये पैसा भी सीधा जन धन अकाउंट में आएगा, जी हाँ कोई रेवेन्यू लीकेज नहीं. इतना ही नहीं सरकार की योजना है की अगले बजट में Burnol के शेयर में 20000 रुपये तक इन्वेस्ट करने पर इनकम टैक्स में Section 80C के तहत डिडक्शन मिलेगी, यानी की इस रकम पर कोई टैक्स नहीं लगेगा.

सरकार ने यह योजना लांच तो की थी लिबरल समुदाय को राहत देने के लिए, जिनकी जेब पर हर महीने “Burnol” पर बढ़ते खर्च की मार पड़ रही थी, लेकिन हुआ उल्टा, राहत मिलने की जगह जलन और सुलगन बढ़ गई, कई लिबरल मोहल्लों में धुआं उठता दिखाई दिया, अमेरिकी संसद में प्रधानमंत्री के अभूतपूर्व स्वागत और उनके भाषण के दौरान बार बार मिल रही स्टैंडिंग ओवेशन से पहले से ही भरे बैठे लिबरल समुदाय ने इस चिढ़ाने वाली योजना के लिए पीएम पर तीखा हमला बोलते हुए उन्हें बर्नोल का एजेंट करार दिया, चार लोगों के विशाल जनसैलाब को संबोधित करते हुए वरिष्ठ आदर्श लिबरल रवीश मोतिहारवी ने काली स्क्रीन की कसम खाकर कहा कि अपने विदेशी दौरों और भाषणों में प्रधानमंत्री मोदी स्पष्ट रूप से हम लोगों की सुलगाते  नज़र आते हैं, बताइये हर बार साम्प्रदायिकता की शिकायत करने हम लोग जहां पहुँचते हैं,उस देश को भी खरीद लिया, हमारे 65 भाई लोगों ने गुलाबी कागज़ पे जो मोहब्बत का पैगाम ओबामा जी के नाम भेजा था, उसकी भी परवाह नहीं की, आखिरकार हम कहाँ तक झेलें, अब ये स्पष्ट हो गया है कि ये सरकार ठंडक देने की नहीं सुलगाने की राजनीति कर रही है. मोदी जी की इस यात्रा से डोनाल्ड ट्रम्प जैसे लोगों को और बल मिलेगा और हमलोगों की रही सही उम्मीद भी जाती रहेगी.

तमाम राजनीतिक दलों ने भी एक स्वर में सरकार की इस योजना की भर्त्सना की है, राज्यसभा का आधा समय अकेले खा जाने के लिए कुख्यात लेफ्ट नेता सीताराम येचुरी ने इसे पूंजीपतियों के इशारे पर किया गया काम बताया, उन्होंने ये भी कहा की प्रधानमंत्री ने खुद बर्नोल के शेयर में पैसे लगा रखे हैं, ये साफ़ साफ़ “Conflict of Interest” का केस है.

आजकल गाहे बगाहे हर बात में फिंगरिंग करने की बुरी आदत से ग्रस्त किशोर नेता और कांग्रेस उपाध्यक्ष श्री राहुल गाँधी ने “हर किसी के फटे में टांग दो योजना” के तहत सरकार पर हमला बोलते हुए इसे “अल्लम गल्लम मलहम” की सरकार बताया, और प्रधानमंत्री से जवाब माँगा, लेकिन तभी पास से गुजरतीं मम्मी को देखकर वे अचानक दूसरी ओर निकल गए.

ध्रुवीकरण की साज़िश को दूर से ही सूंघकर पता कर लेने की क्षमता से लैस चिरांडू प्रतिभा के धनी “कभी टोपी कभी तिलक फेम” बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश “चन्दन” कुमार ने इसपर सबसे जबरदस्त प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री यहाँ बर्नोल पर सब्सिडी देकर लोकलुभावन राजनीति कर रहे हैं और दूसरी ओर एक परम सेक्युलर देश में एकता और अखंडता को तोड़ रहे हैं, बिहार में वोटों का ध्रुवीकरण करने की इस चाल को मैं खूब समझता हूँ, क्या वो मंदिर के साथ साथ मस्जिद के लिए जमीन नहीं मांग सकते थे, बिहार की जनता सब देख रही है”… ये बयान इतना जोरदार रहा कि बगल में बैठे भुजंग प्रसाद भी चन्दन कुमार की ओर आपत्तिजनक इशारा करते हुए ठठाकर हंसने लगे.

दिल्ली सचिवालय के एक बंद कमरे से “मेरे पंद्रह लाख कहाँ हैं, मेरे पंद्रह लाख” की आवाज़ें सुनाई दीं तो वहीं हैदराबाद  के एक पब्लिक टॉयलेट से आवाज़ आती रही, बस पंद्रह मिनट के लिए सारे टीवी चैनल बंद कर दो…..

— “इन्स्पेक्टर भगजुगनी की विशेष रिपोर्ट”

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Thank You Dhoni

ढाई साल पहले दिल्ली आया था, झारखण्ड के एक छोटे से शहर से.. पहली बार इतनी चकाचौंध, इतनी भीड़, इतनी ऊंची इमारतें देखी थीं… पहली बार सुना था कि “ऑडिटोरियम” में क्लासेज भी होती हैं.. पहली बार हज़ार स्टूडेंट्स एक क्लास में देखे थे.. बहुत से दोस्त बने, दिल्ली के भी, दिल्ली के बाहर के भी… लेकिन बहुत से लड़के लड़कियों में मेट्रोवाला होने की वजह से एक अलग टाइप का “ऐटीट्युड” होता था (अभी भी होता होगा).. “ये वर्ग”  या तो बहुत ही घटिया सामान्य ज्ञान वाला है, या ये अपने आप को पूरे देश से ऊंचा समझता है.. “सुपीरियरिटी काम्प्लेक्स ग्रस्त”

इनसे जब भी बात होती थी तो ये ऐसा दर्शाते थे कि मानो दिल्ली भारत की नहीं बल्कि भारत दिल्ली की राजधानी है.. इनसे बातें तो बहुत हुईं.. पर जो “सवाल जवाब” सबसे ज्यादा होते थे, वो कुछ ऐसे थे…

*”अरे शशांक… कहाँ से हो तुम ?”

“मैंएए.. झारखण्ड से”

*”ये झारखण्ड कहाँ पड़ता है, मैप में किधर है , साउथ में है क्या ”

“नहीं नहीं, वहाँ नहीं है, झारखण्ड पहले बिहार का पार्ट था, अब एक अलग स्टेट है.”

*”अलग स्टेट है, सच्ची में ?”

“हाँ यार, अपने कैप्टेन धोनी का स्टेट..”

“ओ आई सी !!!!!”

(अनगिनत बार पता बताने के लिए महेंद्र सिंह धोनी का नाम लेना पड़ा है इधर, थैंक यू धोनी… )

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The little man has hit the big fella for six.. what a player.. what a wonderful player.

आज भी क्रिकेट वीडियो फोल्डर से गुज़रते वक़्त जब टोनी ग्रेग की ये आवाज़ कानों में जाती है, तो याद आता है शारजाह, सचिन, रेतीला तूफ़ान और अपना ब्लैक एंड वाइट टीवी..

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सवा पांच साल ही उम्र थी उस समय अपनी, क्रिकेट देखना शुरू ही किया था, सचिन के चार बेहतरीन साल 1994 से 1997 बाद में यू ट्यूब पर छोटे छोटे वीडियोज के रूप में ही देख पाया. क्रिकेट की सनक ऐसी कि घर में खिड़की, दरवाज़े या लकड़ी काठी का कोई भी काम लगा हो, अपने लिए एक बैट तो बनेगा ही, घर आये मेहमान वापस जाते वक़्त कोई नोट थमा देते और मम्मी TDS काटने के बाद उसमें से जो भी अमाउंट हमें दे देतीं, उससे MRF स्टीकर ही आता था. बचपन के काफी सालों तक MRF को बल्ला बनाने वाली कम्पनी ही समझता रहा.

हालांकि TV तो कभी बंद नहीं किया तुम्हारे आउट होने के बाद जैसा बहुत लोग क्लेम करते रहे हैं, इसको ब्लेसफेमी ना समझा जाए, क्योंकि फैन होने का वही एक क्राइटेरिया नहीं है, हमने भी बैक फुट पंच और स्ट्रेट ड्राइव लगाने की बहुत प्रैक्टिस की है।

चैंपियन गेंदबाजों के फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन पर जितना अत्याचार तुमने किया है 90 के दशक में वही जानते हैं। उस समय फैशन नहीं था, वरना कई मैन ऑफ द मैच अवार्ड लौटाए गए होते इस तानाशाही बैटिंग के विरोध में,  जहां तक वन डे क्रिकेट की बात है ठीक से दाढ़ी मूंछ भी नहीं आई होगी तब से तुम टीम में गार्जीयन की तरह खेलने लगे थे।

2003 में भी कोई उम्मीद नहीं थी वर्ल्ड कप की, हम बस यही चाहते थे कि पाकिस्तान से जीत जाएँ किसी तरह, बाकी कोई गल नहीं, सुपर स्पोर्ट्स पार्क (सेंचुरियन) में पाकिस्तान का मंचूरियन बना डाला तुमने, वसीम अकरम के सामने सेहवाग की बजाये खुद पहली बॉल पे स्ट्राइक लेना, शोएब अख्तर का “तोहफा” कबूल करना, अब्दुल रज्जाक को वसीम अकरम से ज्ञान दिलवाना कि उसने किसका कैच छोड़ा है और आने वाले ओवरों में  “मौका मौका” वाले ऐड के लिए भरपूर इंतज़ाम कर देना याद रहेगा. इस वर्ल्ड कप में तुम्हारी बैटिंग ने अपना 1996 का वर्ल्ड कप ना देख पाने का मलाल दूर कर दिया.

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आलोचकों का तो पता नहीं पर 2005-06 में हमें भी एकाध बार डर लगा कि तुम्हारा टाइम आ गया है, पर बाद में गलत साबित होने पर बहुत ख़ुशी हुई… 2009 में हैदराबाद में ऑस्ट्रेलिया के साढ़े तीन सौ का पीछा करते हुए 175 रन की पारी देखकर 1998 का शारजाह याद आ गया था। हैदराबाद में भी लगभग जीता ही दिया था तुमने। अगले साल 24 फ़रवरी को रवि शास्त्री की बोली गई ये लाइन “First man on the planet to reach 200 and its the Superman from India” भी अब अपने साथ ही जाएगी…

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सचिन तुम केवल खिलाड़ी नहीं इमोशन थे, जिससे मोहल्ले का हर बच्चा, चचा, ताऊ खुद को कनेक्ट कर सकता था, एक पूरी पीढ़ी को क्रिकेट का कीड़ा बना डालने में तुम्हारी बैटिंग का जितना योगदान रहा उतना शायद किसी चीज़ का ना रहा हो. तुम्हारी तरह हम किसी शोएब या वार्न को धो तो सकते नहीं थे इसलिए मोहल्ले के ही किसी लौंडे को शोएब या वार्न समझ लेते थे, बैट के अभाव में कई बार टूटी हुई खटिया की पाटी भी बैट का काम कर जाती थी. हर आँगन  सिडनी और वानखेड़े बन जाता था. कई बार स्टाइलिश दिखने के चक्कर में पॉलिथीन के ग्लब्स भी पहनने पड़े… ट्रम्प कार्ड गेम में भी तुम्हारी शकल वाला पत्ता सबसे ज्यादा वांटेड रहा..  “He has timed that beautifully… that’s been driven handsomely straight back past the bowler for four…… That’s a fierce square cut” इन चीज़ों के चक्कर में बचपन कुछ ज्यादा ही स्ट्रेच हो गया सचिन.. आज फिर नॉस्टैल्जिया में पहुंचे हुए हैं… 

Wishing a very happy birthday to one of the greatest ever batsmen to have blessed the game of cricket….  Sachin Ramesh Tendulkar.

#ThankYouMaster

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After Jats now NDTV damands reservation.

“जाटों के बाद अब NDTV ने माँगा आरक्षण, कहा अर्णब सारी व्यूअरशिप अकेले उड़ा रहा है।”

केंद्रीय राजधानी दिल्ली से सटे नॉएडा से एक चौंका देने वाली खबर सामने आई है, जाट आंदोलन से प्रेरणा लेकर कुख्यात न्यूज़ चैनल NDTV के मालिक श्री प्रणय रॉय ने सूचना और प्रसारण मंत्रालय को पत्र लिखकर रात 9 से 11 के प्राइम टाइम स्लॉट में 40% आरक्षण की मांग की है। कल जैसे ही पिछले हफ्ते की TRP के आंकड़े सामने आये, NDTV के स्टूडियो में घमासान मच गया, गौरतलब है कि आंकड़ों में स्पष्ट हुआ है कि प्राइम टाइम (9 से 11) में अर्णब गोस्वामी के शो न्यूज़आवर की व्यूअरशिप 82% है जबकि NDTV की मात्र 3%।

मालिक प्रणय रॉय बरखा दत्त (नीरा राडिया टेप फेम) और निधि राजदान को डांटे जा रहे थे, कह रहे थे, तुम दोनों मिलकर NDTV का हाल किंगफिशर एयरलाइन्स जैसा कर दोगे, मुझे तो लग रहा है कि यदि हम कुछ सेटिंग करके “टाइम्स नाउ” से ही फीड लेकर न्यूज़ चलायें तो ज्यादा लोग देखेंगे। भला ही जीसस का कि टाइगर बचाने वाला प्रोजेक्ट अभी भी है अपने पास, वो ना होता तो तुम दोनों को भी अपनी सैलरीे के लिए दिल्ली नगरनिगम के कर्मचारियों जैसा आंदोलन करना पड़ता । सुधर जाओ, क्रांति से बाज आओ, ये 2011 नहीं 2016 है  ।