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The Godfather of Indian batsmanship

सुनील गावस्कर को “Godfather of Indian batsmanship” कहा जाय तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. जिस दौर में भारतीय बल्लेबाजों को तेज गेंदबाजी के सामने कमजोर माना जाता था उस समय भारतीय क्रिकेट के पटल पर उदय हुआ सुनील गावस्कर का. पाँच फुट पाँच इंच कद वाला ये खिलाड़ी ठोस तकनीक और मजबूत इच्छाशक्ति का धनी था..

1971… भारत का वेस्ट इंडीज़ दौरा… पोर्ट ऑफ स्पेन टेस्ट… ये सीरीज का दूसरा टेस्ट था, इसमें सनी भाई का डेब्यू हुआ, पहली बारी में 65 और दूसरी में मैच विनिंग 67 नाबाद… भारत ने ये मैच 7 विकेट से जीता, वेस्ट इंडीज़ पर यह हमारी पहली विजय थी, अगले तीन टेस्ट मैचों में सुनील गावस्कर ने तीन शतक और एक दोहरा शतक बनाया और भारतीय टीम 1-0 से सीरीज जीत गई… 4 मैचों में 154 की औसत से 774 रन बनाकर सुनील गावस्कर ने अपने लक्षण दिखा दिए थे.

1975-76 में भारतीय टीम एक बार फिर से वेस्ट इंडीज़ में थी. मैदान वही पोर्ट ऑफ स्पेन का जहाँ सनी भाई का डेब्यू हुआ था. चौथी पारी में 403 रनों के लक्ष्य… सुनील गावस्कर ओपन करने उतरे… 103 रनों की पारी खेली.. इसके बाद गुंडप्पा विश्वनाथ के 112 की बदौलत भारत ने असंभव लक्ष्य प्राप्त कर लिया.

1979 में दूसरे क्रिकेट विश्वकप में अपने सारे मैच हारने के बाद भारतीय टीम एक बार पुनः इंग्लैंड में थी… पहला टेस्ट हार चुकी थी, दूसरा ड्रॉ हो चुका था, तीसरे में जीतकर सीरीज ड्रॉ करने की आशा जीवित थी. लंदन में ओवल का मैदान… चौथी पारी में 438 रनों के लक्ष्य….. ये लक्ष्य ऐसा था जिसके सामने 2018 में भी टीमें ड्रॉ के लिए खेलने का प्रयास करेंगी.. लेकिन भारतीय टीम ने चौथे दिन का खेल समाप्त होने तक बिना विकेट के 76 रन बना लिए थे, अंतिम दिन 362 रनों की आवश्यकता.. सुनील गावस्कर ने अविश्वसनीय बल्लेबाजी की… भोजनावकाश से पूर्व गावस्कर और चेतन चौहान ने 93 रन और जोड़े, स्कोर 169/0… दूसरे सत्र में ड्रिंक ब्रेक तक 213/0 … अभी तक मैच ड्रॉ होता ही दिखाई दे रहा था. अगले एक घंटे में गावस्कर ने गियर बदला और स्कोर 304/1 .. ओवल में उपस्थित दर्शकों को अब यह लक्ष्य संभव लगने लगा था.. अंतिम सत्र में 134 रनों की आवश्यकता, 9 विकेट शेष… अंग्रेज कप्तान माइकल ब्रेरली ने ओवररेट धीमी कर दी. गावस्कर का दोहरा शतक पूरा हो चुका था.. अब स्कोर था 366/1, अब 12 ओवरों में 76 रन चाहिए थे. दिलीप वेंगसरकर इयन बॉथम को कैच दे बैठे और उनके बाद आये युवा खिलाड़ी कपिल देव 0 पर आउट हो गए.. सभी आश्चर्य में थे कि कप्तान वेंकटराघवन ने नम्बर 4 पर गुंडप्पा विश्वनाथ को न भेजकर कपिल को क्यों भेजा, इससे पिछली बार जब भारत ने 403 का लक्ष्य प्राप्त किया था तो उसमें गावस्कर और विश्वनाथ दोनों ने शतक लगाए थे. 389 के स्कोर पर सुनील गावस्कर चौथे विकेट के रूप में 221 के व्यक्तिगत स्कोर पर इयन बॉथम की गेंद पर डेविड गावर को कैच दे बैठे, 8 घंटे से अधिक समय बल्लेबाजी करने के बाद वो टीम को वो विजय के द्वार पर ले जा चुके थे पर दुःखद ये रहा कि टीम 46 गेंदों में 49 रन नहीं बना पाई. सुनील गावस्कर की ये पारी आज भी टेस्ट मैच में रन चेज़ में खेली गई सर्वश्रेष्ठ पारियों में गिनी जाती है।

1979 में भारतीय टीम पाकिस्तान दौरे पर गई तो इमरान खान ने सुनील गावस्कर को तेज गेंदबाजों के खिलाफ सबसे बेहतरीन बल्लेबाज कहा.. कहें भी क्यों न…. वेस्टइंडीज़ जैसी टीम टीम के खिलाफ 13 शतक लगाना सबके बस की बात तो नहीं…

बिना किसी खास प्रोटेक्शन के माइकल होल्डिंग, एंडी रॉबर्ट्स, मैल्कम मार्शल और डेनिस लिली जैसे खूँखार गेंदबाजों का सामना करने के बाद शीर्ष पर रहने वाला बल्लेबाज.. उन्हें ये बताने वाला कि आप भले ही डेढ़ सौ किलोमीटर प्रतिघंटे से ज्यादा तेज गति से बॉडीलाइन गेंदबाजी कर लो, मैं गिरने वाला नहीं… आप घायल करके या डरा के मुझे पवेलियन नहीं भेज सकते, मेरा विकेट लेने के लिये आपको बहुत ज्यादा मेहनत करनी पड़ेगी….. टेस्ट क्रिकेट में नौ हजार और दस हजार रन बनाने वाला पहला बल्लेबाज, 30 शतकों तक पहुंचने वाला पहला बल्लेबाज… ऐसा खिलाड़ी जिसने भारतीय बल्लेबाजों की आने वाली पीढ़ियों को बताया कि वो उच्च स्तरीय तेज गेंदबाजी को न सिर्फ खेल सकते हैं बल्कि डॉमिनेट कर सकते हैं, आवश्यकता है तो मजबूत तकनीक और कलेजे की।

भारतीय क्रिकेट के पूर्व कप्तान और सार्वकालिक महानतम टेस्ट बल्लेबाज सुनील गावस्कर को जन्मदिन पर शुभकामनाएं।

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The Prince of Kolkata

कहावत है “A leader is one who knows the way, shows the way and goes the way”

सौरव गांगुली का नाम सामने आते ही मात्र एक क्रिकेटर का चेहरा सामने नहीं आता बल्कि बहुत सी यादें ताजा हो जाती हैं, सचिन तेंदुलकर के साथ शानदार ओपनिंग पार्टनरशिप.. लेफ्ट आर्म स्पिनर को आगे बढ़कर लगाया हुआ छक्का… तेज गेंदबाज पर मारी गई कवर ड्राइव.. सब दिमाग में घूमने लगते हैं. राइटहैंडर होने के बाद भी लेफ्टी बनके और शरीर का पिछला हिस्सा थोड़ा सा निकाल के सौरव गांगुली बनने की कोशिश सबने की है… मुहल्ले के लेफ्टी बल्लेबाज तो वैसे भी सौरव गांगुली ही मानकर चलते थे खुद को.

1996 में जब भारतीय क्रिकेट टीम इंग्लैंड दौरे पर गई तो टेस्ट सीरीज में दो ऐसे लड़के मिले जो लंबे समय तक भारतीय टीम के स्तंभ बने रहे.. उनमें से एक नाम था सौरव गांगुली… बंगाल से रणजी ट्रॉफी खेलने वाला नौजवान..

पहले टेस्ट में मौका नहीं मिला, इंग्लैंड ने ये मैच 8 विकेट से जीत लिया… दूसरे टेस्ट में नम्बर 3 पर बल्लेबाजी करने आए सौरव ने अद्भुत बल्लेबाजी का परिचय दिया… लगा ही नहीं कि ये उनका पहला टेस्ट मैच है. तेज गेंदबाजों के खिलाफ शानदार स्क्वेयर कट और कवर ड्राइव…. स्पिन के खिलाफ जादुई बल्लेबाजी.. तीसरे टेस्ट की पहली पारी में 137 और दूसरी में 48… हम ये सीरीज 0-1 से हार गए लेकिन दो शानदार युवा बल्लेबाज मिले, जो भारतीय क्रिकेट की गोल्डन जेनरेशन के ध्वजवाहक बने…

18 जनवरी 1998…. ढाका में इंडिपेंडेंस कप का फाइनल… भारत बनाम पाकिस्तान.. बेस्ट ऑफ थ्री फाइनल्स में पहले दो मैचों में 1-1 की बराबरी के बाद तीसरा मैच…. पाकिस्तान ने 314 रनों के पहाड़ खड़ा कर दिया, उस समय 314 आज के 380 जैसा था… सौरव ने 124 रनों की पारी खेली और रॉबिन सिंह के साथ एक मैच जिताऊ साझेदारी की… आखिरी ओवर सकलेन मुश्ताक डाल रहा था, ओवर की पांचवीं गेंद जब हृषिकेश कानितकर के बल्ले से निकल कर बाउंड्री की ओर गई तो विश्वास नहीं हो रहा था कि हमने 300 से ऊपर का लक्ष्य चेज़ कर लिया.

मैच फिक्सिंग स्कैण्डल…. बड़े बड़े खिलाड़ियों की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे, कुछ पर प्रतिबंध लगा…. टीम में नए खिलाड़ी आये.. सौरव गांगुली को कप्तान बनाया गया…. इसके बाद भारतीय क्रिकेट में एक नई कहानी शुरू हुई… 2000 की चैंपियंस ट्रॉफी जिसमें युवराज सिंह और ज़हीर खान जैसे खिलाड़ियों की बदौलत टीम फाइनल तक गई…. इस टीम में कुछ अलग बात थी, नए खिलाड़ी स्लेजिंग का जवाब देना जानते थे… कप्तान की तरफ से जबरदस्ती की रोक टोक नहीं थी.. अगर अंग्रेजी में गाली दोगे तो बदले में BSDK सुनने को मिलेगा…

2001… ऑस्ट्रेलिया का भारत दौरा… इससे पिछली टेस्ट सीरीज में ऑस्ट्रेलिया यहाँ से हारकर गई थी… दौरे से पहले महान ऑस्ट्रेलियन कप्तान स्टीव वॉ ने भारत को “Final frontier” कहा था… वो 15 टेस्ट मैच लगातार जीतने के बाद भारत आए थे, मुम्बई में पहला टेस्ट मैच 3 दिनों में समाप्त हो गया, ऑस्ट्रेलियन टीम ने दस विकेट से डरा देने वाली जीत हासिल की… अगला मैच कोलकाता में, ऑस्ट्रेलिया ने 445 रनों के स्कोर खड़ा कर दिया और बदले में हमारी पहली पारी 171 पर सिमट गई… ऐसा लगा कि स्टीव वॉ अपना लक्ष्य पूरा कर लेंगे… अगले तीन दिनों में लक्ष्मण, द्रविड़ और हरभजन ने जो किया उससे स्टीव वॉ का इंतज़ार बढ़ गया और चेन्नई में भारत की जीत के साथ ये तय हो गया कि वॉ का भारत में टेस्ट सीरीज जीतने का सपना अभी सपना रहेगा.

2002 में भारतीय टीम लॉर्ड्स में नेटवेस्ट सीरीज का फाइनल खेल रही थी.. मार्कस ट्रेसकौथिक और नासिर हुसैन के सैकड़ों के बाद एक बार फिर फाइनल में 300 से ऊपर का लक्ष्य… कप्तान सौरव और वीरू की तूफानी शुरुआत… उसके बाद हमेशा की तरह विकेटों का शीघ्रपतन… स्कोर 145 पर 5… दो नए लड़के क्रीज़ पर… युवराज और कैफ.. दोनों ने जो किया वो सोच के आज भी आदमी नॉस्टेल्जिया में चला जाता है…. इसके बाद लॉर्ड्स की बालकनी से जर्सी लहराते सौरव गांगुली.. वो तस्वीर आज भी भारतीय क्रिकेट फैन्स के मन में ताज़ा है.

23 मार्च 2003….. जोहानेसबर्ग का वांडरर्स स्टेडियम… बचपन का सबसे दर्द भरा दिन…. विश्वकप में एक शानदार कैम्पेन के बाद फाइनल में पहुँची भारतीय टीम ऑस्ट्रेलिया से बुरी तरह हार गई.. आमतौर पर उस समय ये मानकर चलते थे कि ऑस्ट्रेलिया से तो हारना ही है, लेकिन उस विश्वकप में टीम के प्रदर्शन ने उम्मीदें जगा दी थीं…

खैर… टीम हार गई… रिकी पोंटिंग के बल्ले में स्प्रिंग वाली कहानियां मार्किट में चलती रहीं… हम धीरे धीरे बड़े होते रहे…. ऑस्ट्रेलिया से हारते और बाकी टीमों से जीतते रहे… इसके बाद चैपल एपिसोड हुआ लेकिन सौरव क्या करते, ये उनका खुद फैलाया हुआ सनीचर था… सनीचर वो खुद ही उठाकर लाये थे ऑस्ट्रेलिया से…. टीम से बाहर होना पड़ा पर उसके बाद शानदार वापसी भी की…

एक कप्तान के रूप में सौरव गांगुली की सबसे बड़ी सफलता यही रही कि उन्होंने टीम को लड़ना सिखाया… नए खिलाड़ियों का एक ग्रुप तैयार किया जिन्होंने लम्बे समय तक भारतीय क्रिकेट की सेवा की…. क्या हुआ जो उसने विश्वकप नहीं जीता…

Happy Birthday Dada

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The child of destiny

23 मार्च 2003..

जोहानेसबर्ग का वांडरर्स स्टेडियम. आठवें क्रिकेट विश्वकप का फाइनल. ऑस्ट्रेलिया 359 पर 2. भारत के सामने एक असंभव लक्ष्य. पहले ही ओवर में सचिन तेंदुलकर आउट. उसके बाद 125 रनों से करारी हार. सवाल… क्या भारतीय क्रिकेट की गोल्डन जेनरेशन कभी विश्वकप नहीं जीत पाएगी ..

इन सभी चीजों से दूर 21 साल का एक लड़का खड़गपुर में रेलवे के क्वार्टर में पड़ा था. अगले दिन कौन से प्लेटफार्म पर कौन सी गाड़ी आएगी सोचता हुआ. भारतीय टीम के लिए क्रिकेट खेलना उसका बचपन से सपना था, जिन लोगों ने उसकी बायोपिक देखी है उन्होंने ये सब फ़िल्म में देख लिया होगा. नियति को ये स्वीकार था कि ये लड़का क्रिकेट खेले भारतीय टीम के लिए.

महेंद्र सिंह धोनी का भारतीय क्रिकेट में पदार्पण और उत्थान, सफलता की ऐसी कहानी है जो क्रिकेट में पहले बहुत कम देखी गई है.

रामधारी सिंह दिनकर कहते हैं,

समझे कौन रहस्य ? प्रकृति का बड़ा अनोखा हाल,
गुदड़ी में रखती चुन-चुन कर बड़े कीमती लाल”

किसने सोचा था कि राँची जैसे छोटे शहर से आने वाला लड़का विश्व क्रिकेट पर ऐसे छा जाएगा, मानो कह रहा हो

“चरण का भार लो, सिर पर सम्भालो,

नियति की दूतियों मस्तक झुका लो,

चलो जिस भाँति चलने को कहूँ मैं,

ढलो जिस भाँति ढलने को कहूँ मैं”

जब सौरव गांगुली ने पूरे विश्वकप में राहुल द्रविड़ से कीपिंग कराई तो इसके पीछे एक विवशता थी, वो एक अतिरिक्त बल्लेबाज खिलाना चाहते थे, कोई विकेटकीपर ऐसा था नहीं जो रेगुलर रन बना सके, जिस दौर में दुनिया की अन्य टीमों के पास एडम गिलक्रिस्ट, एंडी फ्लावर, मार्क बाऊचर जैसे विकेटकीपर बल्लेबाजों की लग्जरी थी, हमारे पास ऐसा कोई न था… नयन मोंगिया की विदाई के पांच साल तक प्रयोग चलते रहे, अजय रात्रा, दीप दासगुप्ता, पार्थिव पटेल, दिनेश कार्तिक… इन सबके बाद अवसर मिला महेंद्र सिंह धोनी को..

पहले ही साल में पाकिस्तान और श्रीलंका के खिलाफ दो घोषणात्मक पारियों (Daddy Hundreds) 148 और 183 ने बता दिया था कि भाई मात्र प्रयोग का हिस्सा बनने नहीं बल्कि इतिहास लिखने आया था, ये सिर्फ शुरुआत थी, भारतीय फैन्स को नया पोस्टर बॉय मिल चुका था जो रन चेज़ में चोक नहीं करता था. इसका सबसे अच्छा उदाहरण हमने देखा 2006 में पाकिस्तान में लाहौर और कराची में… लाहौर में 5 विकेट गिरने के बाद बल्लेबाजी करने आये धोनी ने 46 गेंद पर 72 नाबाद बना दिये… फैसलाबाद में 148… भारतीय टीम के इतिहास में विकेटकीपर बल्लेबाज से ऐसी अपेक्षा कभी नहीं कि जाती थी. “दिस बॉय वाज स्पेशल.”

कुछ निर्णय बहुत लंबी प्लानिंग और स्टडी पर आधारित होते हैं, कुछ इंस्टिंक्ट के आधार पर…. कई बार फँसे हुए मैच में कानों में आवाज गूँजती है, “नाद्वे मणिबंधम, बहिर्मुखम”

सलाहकार आपको कहते कि हरभजन सिंह बड़ा गेंदबाज है, इसका एक ओवर बचा है, आखिरी ओवर इसी को दो, कप्तान की इंस्टिंक्ट कहती है, जोगिंदर शर्मा को दो. इसके सामने गलती करेगा मिस्बाह. मिस्बाह ने गलती की और विश्वकप हमारा हुआ।

वर्ल्ड T20 2016 में बांग्लादेश को एक गेंद पर दो रन चाहिए, वो एक हाथ से दस्ताना उतार कर गेंद थ्रो करने के लिए तैयार होता है, लेकिन जैसे ही गेंद हाथ मे आती है, वो गेंद फेंकने की बजाय स्वयं दौड़कर ही स्टम्प्स बिखेर देता है.

चैंपियंस ट्रॉफी 2013 का फाइनल… रवि बोपारा और ऑइन मोर्गन कूट रहे हैं, ईशांत शर्मा को ओवर दोगे तो और कूटेंगे. लेकिन कप्तान की इंस्टिंक्ट ने कहा ईशांत को ही दो, परिणाम ये हुआ कि ईशांत ने दोनों के विकेट ले लिए और चैंपियंस ट्रॉफी 2013 हमारी हुई… सबके बाद में 2011 का फाइनल…. युवराज सिंह शानदार फॉर्म में, पूरे विश्वकप में बेहतरीन प्रदर्शन.. इसको पहले भेजना चाहिए, लेकिन कप्तान को लगता है कि वो मुरली को युवराज से बेहतर खेल सकता है… दो घण्टे बाद नुवान कुलासेकरा की गेंद लॉन्ग ऑन के ऊपर से दर्शक दीर्घा में गिरी और कॉमेंट्री बॉक्स में रवि शास्त्री उछल उठे, “Dhoniiiiiii finishes off in style” ….. 2003 में जोहानेसबर्ग में मिले घाव अब जाके भरे…

उसका पसंदीदा गाना है, “मैं पल दो पल का शायर हूँ”.. वो वर्तमान में रहना पसंद करता है. इनसिक्योर फील नहीं करता अपनी जगह या उपलब्धि को लेकर. 2007 वर्ल्ड टी ट्वेंटी जीतने के बाद अपनी टी शर्ट के बच्चे की ओर फेंकता है और फिर गायब…. 2011 का विश्वकप जीतने के बाद सेलिब्रेशंस में वो कहीं दिखाई नहीं देता, कप्तान के रूप में नाम उसका ही आएगा लेकिन उसे पता है कि ये मोमेंट सचिन तेंदुलकर का है.. 2008 में नागपुर में जब सौरव गांगुली अपना आखिरी टेस्ट मैच खेल रहे हैं तो अंतिम क्षणों में कप्तानी उनको सौंप देता है…….

“मैं पल दो पल का शायर हूँ” में एक लाइन है “मसरूफ जमाना मेरे लिये, क्यों वक्त अपना बर्बाद करे” ….. 30 दिसम्बर 2014.. वो टेस्ट क्रिकेट से सन्यास लेकर सबको चौंका देता है… जब वो कम से कम दो साल और कप्तान रह सकता था, जनता के बीच सुपरहीरो इमेज, 10 टेस्ट बाकी थे 100 होने में, कुछ रन बचे थे 5000 होने में.. तमाम तरह की कॉन्सपिरेसी थ्योरी लिखी जाती हैं उसकी रिटायरमेंट पर. 2017 में वो वन डे T20 की कप्तानी भी विराट कोहली को सौंप देता है, क्योंकि उसे पता है 2019 के लिए विराट को समय चाहिए. इसके बाद भी विकेट के पीछे से आधी कप्तानी संभालता है ताकि विराट कहीं भी फील्डिंग कर सके…

2018 में चेन्नई सुपर किंग्स की वापसी होती है आईपीएल में, सारे खिलाड़ी 30-35 साल के, सीनियर सिटीजन टीम कहकर मजाक भी बनता है इनका… लेकिन यही टीम इन्हीं सीनियर सिटीजन्स के दम पर चैंपियन बनती है.

आज जब कई बार धोनी को स्ट्रगल करते देखते हैं तो लगता है समय हो गया, लेकिन अंदर से आवाज़ आती है, “मssहेन्द्र बाहुबली को जीssssना होगा”

जिस तरह टेस्ट क्रिकेट से गया…. इसी तरह एक दिन वोे लिमिटेड ओवर क्रिकेट से भी चला जाएगा… एकदम से… अचानक… लेकिन जाने से पहले वो देश के कोने कोने में बैठे लड़कों को बता चुका है कि चाहे आप कहीं से आते हों आप शिखर पर जा सकते हैं.

Wishing happy birthday to one of the greatest of all time. Happy Birthday MS Dhoni…

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When Kapil Dev’s men defeated the mighty West Indies.

“Invincibles ?? We will put their name to the test…”

25 जून 1983…. क्रिकेट इतिहास की सबसे महान और डॉमिनेटिंग टीम और एक उभरती हुई टीम के बीच क्रिकेट की सबसे बड़ी ट्रॉफी उठाने के लिए खेला गया एक मैच….. तीसरे क्रिकेट विश्वकप का फाइनल..

वेस्ट इंडीज़ इससे पहले के दोनों विश्वकप जीत चुकी थी… कप्तान क्लाइव लॉयड 1975 के फाइनल में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ विजयी शतक लगा चुके थे, वहीं 1979 में वन डे इतिहास के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी सर विवियन रिचर्ड्स ने कॉलिस किंग के साथ मिलकर इंग्लैंड के गेंदबाजी आक्रमण की खाल उधेड़ कर रख दी.

यह टीम 1983 में भी फेवरेट थी… हो भी क्यों न ओपनर गॉर्डन ग्रीनिज और डेस्मंड हेन्स जैसे, इनके बाद स्वयं सर विव, लैरी गोम्स और करिश्माई कप्तान क्लाइव लॉयड.. गेंदबाजों में माइकल होल्डिंग, एंडी रॉबर्ट्स, जोएल गार्नर और मैल्कम मार्शल की “Fearsome Foursome” …. कौन सोच सकता था इस टीम के सामने जीतने का.

वेस्ट इंडीज़ और भारत एक ही ग्रुप में थे, चार टीमें थीं ग्रुप में… विंडीज़, भारत, ऑस्ट्रेलिया और जिम्बाब्वे… हर टीम को अन्य 3 टीमों से 2 मैच खेलने थे… ग्रुप स्टेज में हमने वेस्ट इंडीज़ और ऑस्ट्रेलिया को एक एक मैच हराया और उनसे एक एक मैच हारे…. इसके बाद कपिल देव की 175 रन की पारी आई… जो वर्ल्ड कप इतिहास की सर्वश्रेष्ठ पारियों में से एक है…. 6 में से 5 मैच जीतकर वेस्ट इंडीज़ टॉप पर रही और 6 में 4 जीतकर भारत दूसरे स्थान पर. सेमीफाइनल में भारत के सामने थी इंग्लैंड… संदीप पाटिल और यशपाल शर्मा की बदौलत भारत ने 214 रन का लक्ष्य बड़ी आसानी से प्राप्त कर लिया….

अब आया फाइनल…. भारतीय टीम के लिए विश्वकप का फाइनल खेलना ही बहुत बड़ी उपलब्धि थी, सामने स्पोर्ट्स इतिहास की सबसे डोमिनेटिंग टीमों में से एक….फुटबॉल में पेले की ब्राज़ील, बास्केटबॉल में माइकल जॉर्डन की शिकागो बुल्स का जो रुतबा था वही क्रिकेट में क्लाइव लॉयड की वेस्ट इंडीज़ का था…. यदि 25 जून को हम फाइनल हार भी जाते तो भी कोई न पूछता कि क्यों हार गए, कैसे हार गए क्योंकि सामने वेस्टइंडीज़ थी…

लॉर्ड्स का मैदान, तीस हजार दर्शक… वेस्टइंडीज़ ने टॉस जीता और भारत को बल्लेबाजी करने उतारा…. मात्र 2 रन के स्कोर पर माइकल होल्डिंग ने सुनील गावस्कर को चलता कर दिया.. श्रीकांत और मोहिंदर अमरनाथ ने पारी को संभाला. श्रीकांत ने 38 रन बनाए जो उस मैच में किसी खिलाड़ी का सबसे बड़ा स्कोर था… 54.4 ओवरों में 183 रन पर पारी सिमट गई … उसके बाद प्रश्न इतना ही बचा था कि वेस्ट इंडीज़ कितनी जल्दी इस स्कोर को चेज़ करके मैच खत्म कर देगी और विश्वकप की हैट्रिक लगाएगी….

बलविंदर सिंह संधू की गेंद अंदर आई और गॉर्डन ग्रीनिज के बैट को बीट करके सीधा ऑफ स्टंप के टॉप पर लगी.. थोड़ा उत्साह आया जो सामने से आते विव रिचर्ड्स को देखकर बड़ी जल्दी खत्म भी हो गया. विव रिचर्ड्स ने क्रीज़ पर आने के बाद पिच को बैट से थोड़ा ठोका और उसके बाद तय किया कि 183 में से 150 रन वे स्वयं बना देंगे… आते ही चौकों की झड़ी लगा दी, मदन लाल ने कप्तान कपिल से एक ओवर और देने को कहा…. कपिल ने मदनलाल की ओर देखा और कहा “कर ले”… उसी ओवर में मदन लाल की एक शॉर्ट पिच गेंद को दर्शक दीर्घा में पहुंचाने के प्रयास में गेंद विव रिचर्ड्स के बल्ले के टॉप एज पर लगी और बीच मैदान में उठ गई….. कपिल देव ने उल्टी दौड़ लगानी शुरू की… करीब 20 यार्ड की दौड़ के बाद जब उन्होंने गेंद को लपका तो उनके चेहरे पे एक राहत भरी मुस्कान थी, मानो कह रहे हों “बच गए” ….

अब धीरे धीरे उम्मीदें बढ़नी शुरू हुईं… एक के बाद एक लैरी गोम्स, क्लाइव लॉयड, डुजोन पवेलियन लौटने लगे…. किसी को विश्वास नहीं हो पा रहा था कि क्या हो रहा है, मैल्कम मार्शल के आउट होने के बाद स्कोर 124 पर 8 हो चुका था… 140 रन का स्कोर….. मोहिंदर अमरनाथ की गेंद माइकल होल्डिंग के पैड पर लगी….. स्टेडियम में मौजूद सारे दर्शक स्तब्ध थे, ये क्या हुआ… वेस्ट इंडीज़ 43 रनों से मैच हार गई थी…. 24 साल के कपिल देव के हाथ में विश्वकप था.. हमने क्लाइव लॉयड की वेस्ट इंडीज़ को विश्वकप फाइनल में पराजित कर दिया था..

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The thrill of the chase

By Peter Roebuck

Brian Lara’s unbeaten 153 against the Australians in Bridgetown is widely and justifiably regarded as the greatest chasing innings Test cricket has known. Throughout this epic performance Lara knew he could not afford to make a single misztake. Throughout, the Australians fought for his wicket like mongrels over a bone but Lara refused to oblige. Instead he constructed a masterpiece of batting that turned impending defeat into sudden and unexpected victory.

The innings is illuminated by its context. Before the series began, Lara had been as close to disgrace as any cricketer can be who has not offended a steward at Lord’s. West Indies had lost heavily in South Africa, hardly putting up a fight. Then they were trounced by Australia in the first match of this series. Lara appeared incapable of stopping the slide. At last he responded by scoring 213 in Jamaica, an innings that caught the Australians off guard and allowed the hosts to square the series. It was the start of an astonishing sequence of innings from Lara. His range was extraordinary, like an actor who had played drama, tragedy and comedy in successive performances and triumphed in them all.

Australia dominated the opening three days of the Third Test. Steve Waugh set the tone with a rugged 199 as Australia scored 490. West Indies subsided to 98 for 6 before the fightback began with a partnership of 153 between Sherwin Campbell and Ridley Jacobs.

Next day, West Indies continued their resurgence by bowling the Australians out for 146, leaving a target of 308 for victory. When three early wickets fell that fourth evening, it seemed the cause was lost. Overnight Lara was two not out.

West Indies’ position continued to deteriorate on Day Five till they were 105 for 5. Now Lara made his move, slipping through the gears, pressing hard upon the accelerator, taking the corners as fast as he dared and hoping that colleagues could survive in his slipstream. Jimmy Adams obliged, defending obdurately as the score mounted. Meanwhile, the ground was filling as news spread that West Indies were putting up a fight and that Lara was still batting.

Gradually the tension mounted and the noise rose as spectators lived and died with every ball. West Indies suffered further setbacks and Curtly Ambrose arrived at the crease with 60 runs needed and only two wickets left. Ambrose rose to the occasion, defending doggedly for 82 minutes. Meanwhile Lara drove and swept and pulled and calculated, a vibrant figure, a flashing blade and a ticking brain.

Australia surged again, fighting to save the day. Lara edged and his head recoiled in relief as the ball eluded Ian Healy’s gloves. Ambrose fell and Courtney Walsh appeared, a lanky, improbable figure and not at all a reassuring sight for thousands of supporters, let alone an exhausted captain needing a further seven runs for victory – so near and so very far away! Somehow Walsh kept out a searing inswinging yorker, the ball of the series, and then the Australians must have suspected the game was up. A wide followed, and a no-ball as the bowlers strained mind and muscle. Walsh endured, Lara took strike and smashed the winning runs through cover. Only in this moment of victory did he show any emotion, not that he had much choice as team-mates hugged him. As Wisden put it, he had “guided his team to victory as though leading the infirm through a maze”.

Former Somerset captain Peter Roebuck is a leading cricket writer

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An Open letter from an intellectual to all his interns

दोस्तों, अजीजों एवं प्यारे प्यारे भतीजों, इंसानियत का दुश्मन मोदी देश को आगे ले जाने का प्रयास कर रहा है, हमलोगों ने देश की तरक्की में पलीता लगाने के लिए जो कुर्बानियां दी थीं, वो जाया होती दिखाई दे रही हैं, लेकिन हम हार नहीं मानेंगे, हमारे प्रौढ़ साथी राजदीप ने एक वाट्सऐप मैसेज में कहा है कि मोदी ने GST लाकर एक देश एक टैक्स की दिशा में जो कदम उठाए हैं, उसके विरोध में अब हम हल्ला बोलेंगे, उनका संदेश है कि कोई भी कौमी-कांग्रेसी किसी भी दुकान से ऐसा कोई सामान नहीं खरीदेगा जिसपर GST लगा हो, कोई भी कौमी- कांग्रेसी GST की रिटर्न नहीं भरेगा. यहाँ तक कि जिन साथियों ने आधार और पैन लिंक करा दिए हैं वो इन दोनों चीजों को आग लगा कर इस लिबरल क्रांति को ऊर्जा दें. 

इस असहयोग आंदोलन से ईर्ष्या के कारण अगर कोई राह से भटका हुआ सरकारी कर्मचारी हम पर जुर्माने के लिए दबाव डालता है, तो पर हम उसे पहले Scroll और Wire जैसी वेबसाइट्स के एक एक आर्टिकल पढ़ने को देंगे. यदि उसके बाद भी उसके ब्रेन में सेल्स बचे रहते हैं और वो लिब्रलिज़्म की दीक्षा लेने से इनकार कर देता है, तो आखिरी चारे के रूप में हर लिबरल, ऋषि विश्वामित्र का यज्ञ भंग करने का प्रयास करने वाली अप्सरा मेनका का रूप धर लेगा और उसे वो थ्री इडियट वाला तोहफा क़ुबूल करने को मजबूर कर देगा, कुछ भी हो जाये न हम टैक्स देंगे लेंगे और न ही रिटर्न भरेंगे, क्योंकि आसमानी किताब में कहीं भी ऐसा करने का जिक्र नहीं है. हमारा फिदायीन दस्ता देश की वाट लगाने को एकदम तैयार है.

जीवे जीवे लिबरलिस्तान

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“आखिर क्यों रवीश कुमार जी फ़िल्म क्रिटिक नहीं बने”

रवीश कुमार जी अक्सर फिल्मों के बारे में बात करते नहीं पाए जाते, जब तक कि किसी फिल्म स्टार का कोई स्कैंडल प्रचारित करना भारत एनडीटीवी विदेश संबंधों के लिए क्रूशियल न हो जाए. रवीश जी मुल्क के सबसे ग्लैमरस पत्रकार है. उनका ग्लैमर आमिर शाहरुख की तरह स्क्रिप्ट, मेकअप और फेसलिफ्ट का मोहताज नहीं है, वो सलमान हैं. बिंदास सुल्तान. जो कर दें वही पत्रकारिता. जो लिख दें वही प्रेमगीत.

काफी दिन पहले देव आनंद साहब का एक डुप्लीकेट हुआ करता था, किशोर भानुशाली. रवीश जी ने अपना गेटअप उसी पर मोल्ड किया है कि किशोर भानुशाली अगर चालीस दिन तक बाल डाई न करे तो कैसा दिखेगा.

  खैर ये सब उतना महत्वपूर्ण नहीं है. बात हो रही थी फिल्मों से रवीश जी की अरुचि की. बीस पच्चीस साल पहले जब रवीश जी स्ट्रगलर पत्रकार थे और लालू प्रसाद यादव के छोटे मंत्री लड़के की तरह जवान थे, तो वो उस जमाने के रंगीन अखबार पंजाब केसरी में फिल्मी खबरें लिखा करते थे. एक बार वो  कभी हाँ, कभी न फिल्म देखने गए. वो तो है अलबेला, हजारों में अकेला गाना था जिसमें. शाहरूख खान हीरो. 

रवीश जी फिल्म से बहुत प्रभावित थे, उन्होंने समीक्षा में लिखा कि यदि मैंने कभी फिल्म बनाई तो मैं नई नहीं बनाउंगा, इसी को रीमेक कर लूंगा. उस समय अयोध्या में दिसम्बर बानवे होके चुका था और मुंबई विस्फोटों की प्लानिंग चल रही थी. मतलब भारत नाजुक दौर से गुजर रहा था. तबतक एनडीटीवी को अलग देश के रुप में मान्यता नहीं मिली थी और रवीश जी भारत के ही नागरिक थे. 

रवीश जी आगे लिखते हैं कि फिल्म कभी हाँ कभी न सेकुलरिज़म की एक टेक्स्ट बुक है. इसमें एक मुसलमान लड़के ने हिंदू का रोल किया है और एक हिंदू लड़के ने ईसाई का, और दोनों मिलकर एक ईसाई लड़की से प्यार करते हैं जिसका रोल एक कट्टर द्रविड़ परिवार की लड़की ने किया है और जिसका असली जिंदगी में एक बाप की उमर के पंजाबी से प्रेम प्रसंग चल रहा है. 

इतना ही नहीं, फिल्म में हीरो की शक्ल अपने पिता की बजाय चर्च के पादरी से ज्यादा मिलती है. कुल मिलाकर यह फिल्म सिनेमा के सामाजिक सरोकारों को स्थापित करती है, और विभिन्न धर्मों के बीच मिक्स वेजीटेबल रिश्तों की वकालत करती है.

महीना भर पहले जिन लोगों ने अयोध्या में देश की सेकुलर छवि को ढहा दिया, उनको कुर्सी से बांध कर यह फिल्म दिखाई जानी चाहिए. ताकि देश में कन्फ्यूज किस्म का एकतरफा सेकुलरिज़्म बना रहे. गाने अच्छे हैं, इन्हें आप महफिल में गा सकते हैं, एक गाना कुमार सानू ने मोहम्मद रफी की आवाज में गाया है उसे गाकर आप लड़की भी छेड़ सकते हैं. सिनेमेटोग्राफी साधारण है मगर हीरोइन का मेकअप जिसने किया है, वो जरूर फासीवादी सोच का आर्य आक्रमण कारी मूल का आदमी रहा होगा, जिसने एक सुंदर दक्षिण भारतीय द्रविड़ मूलनिवासी कन्या को बदसूरत दिखाया. 

वैसे आखिरी बीस मिनट को को सेंसर वालों से कटवा देना चाहिए था. फिल्म क्लाईमेक्स तक बहुत अच्छी है मगर निर्देशक अंत में संघ परिवार के दबाव में आ गया, माधव राव गोलवरकर और हेडगेवार के रक्त शुद्धता सिद्धांत के आगे रचनात्मकता टें बोल गई और अंत में ईसाई लड़की की शादी ईसाई दीपक तिजोरी से ही हुई. यहाँ तक कि अंत में हीरो को एक रिफ्यूजी पंजाबी चावला परिवार की लड़की से जबरिया सेट करा दिया गया. फिल्म को मेरी तरफ से पाँच तारा और एक चाँद भी.

बदकिस्मती से फिल्म फ्लॉप हो गई और इसका ठीकरा इस समीक्षा पर फूटा. रवीश जी ने आहत होकर पंजाब केसरी की नौकरी छोड़ दी. असल में वो अखबार था ही नहीं उनके लायक. उन्होंने कसम खाई कि आगे से फिल्मों के चक्कर में नहीं पड़ेंगे. काम की चीज़ सीखेंगे. फिर वो दस पंद्रह साल के लिए गायब हो गए. उनके इन सालों के बारे में किसी को कुछ ज्ञात नहीं है, लेकिन जब वो लौटे तो छा गए. 

रवीश जी आज बहुत बड़े स्टार हैं, उनकी क्रेडिबिलिटी आमिर शाहरुख से बहुत ज्यादा है. फिल्मी सितारों से चिपकने की उन्हें जरूरत भी नहीं है. इसलिए वो अपने कॉमेडी शो पर नई फिल्मों का प्रचार तक नहीं होने देते. बस बीच में दो एक मौके आए थे जब भारत पर दबाव बनाने के लिए आमिर शाहरुख के वाहियात बयानों पर प्रोग्राम चलाया गया था, मगर वो उनकी नौकरी की मजबूरी थी, वो एनडीटीवी गणराज्य के भारत में राजदूत जो ठहरे.

Via- Vikas Agrawal (@Vikasagrawal81)