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“आखिर क्यों रवीश कुमार जी फ़िल्म क्रिटिक नहीं बने”

रवीश कुमार जी अक्सर फिल्मों के बारे में बात करते नहीं पाए जाते, जब तक कि किसी फिल्म स्टार का कोई स्कैंडल प्रचारित करना भारत एनडीटीवी विदेश संबंधों के लिए क्रूशियल न हो जाए. रवीश जी मुल्क के सबसे ग्लैमरस पत्रकार है. उनका ग्लैमर आमिर शाहरुख की तरह स्क्रिप्ट, मेकअप और फेसलिफ्ट का मोहताज नहीं है, वो सलमान हैं. बिंदास सुल्तान. जो कर दें वही पत्रकारिता. जो लिख दें वही प्रेमगीत.

काफी दिन पहले देव आनंद साहब का एक डुप्लीकेट हुआ करता था, किशोर भानुशाली. रवीश जी ने अपना गेटअप उसी पर मोल्ड किया है कि किशोर भानुशाली अगर चालीस दिन तक बाल डाई न करे तो कैसा दिखेगा.

  खैर ये सब उतना महत्वपूर्ण नहीं है. बात हो रही थी फिल्मों से रवीश जी की अरुचि की. बीस पच्चीस साल पहले जब रवीश जी स्ट्रगलर पत्रकार थे और लालू प्रसाद यादव के छोटे मंत्री लड़के की तरह जवान थे, तो वो उस जमाने के रंगीन अखबार पंजाब केसरी में फिल्मी खबरें लिखा करते थे. एक बार वो  कभी हाँ, कभी न फिल्म देखने गए. वो तो है अलबेला, हजारों में अकेला गाना था जिसमें. शाहरूख खान हीरो. 

रवीश जी फिल्म से बहुत प्रभावित थे, उन्होंने समीक्षा में लिखा कि यदि मैंने कभी फिल्म बनाई तो मैं नई नहीं बनाउंगा, इसी को रीमेक कर लूंगा. उस समय अयोध्या में दिसम्बर बानवे होके चुका था और मुंबई विस्फोटों की प्लानिंग चल रही थी. मतलब भारत नाजुक दौर से गुजर रहा था. तबतक एनडीटीवी को अलग देश के रुप में मान्यता नहीं मिली थी और रवीश जी भारत के ही नागरिक थे. 

रवीश जी आगे लिखते हैं कि फिल्म कभी हाँ कभी न सेकुलरिज़म की एक टेक्स्ट बुक है. इसमें एक मुसलमान लड़के ने हिंदू का रोल किया है और एक हिंदू लड़के ने ईसाई का, और दोनों मिलकर एक ईसाई लड़की से प्यार करते हैं जिसका रोल एक कट्टर द्रविड़ परिवार की लड़की ने किया है और जिसका असली जिंदगी में एक बाप की उमर के पंजाबी से प्रेम प्रसंग चल रहा है. 

इतना ही नहीं, फिल्म में हीरो की शक्ल अपने पिता की बजाय चर्च के पादरी से ज्यादा मिलती है. कुल मिलाकर यह फिल्म सिनेमा के सामाजिक सरोकारों को स्थापित करती है, और विभिन्न धर्मों के बीच मिक्स वेजीटेबल रिश्तों की वकालत करती है.

महीना भर पहले जिन लोगों ने अयोध्या में देश की सेकुलर छवि को ढहा दिया, उनको कुर्सी से बांध कर यह फिल्म दिखाई जानी चाहिए. ताकि देश में कन्फ्यूज किस्म का एकतरफा सेकुलरिज़्म बना रहे. गाने अच्छे हैं, इन्हें आप महफिल में गा सकते हैं, एक गाना कुमार सानू ने मोहम्मद रफी की आवाज में गाया है उसे गाकर आप लड़की भी छेड़ सकते हैं. सिनेमेटोग्राफी साधारण है मगर हीरोइन का मेकअप जिसने किया है, वो जरूर फासीवादी सोच का आर्य आक्रमण कारी मूल का आदमी रहा होगा, जिसने एक सुंदर दक्षिण भारतीय द्रविड़ मूलनिवासी कन्या को बदसूरत दिखाया. 

वैसे आखिरी बीस मिनट को को सेंसर वालों से कटवा देना चाहिए था. फिल्म क्लाईमेक्स तक बहुत अच्छी है मगर निर्देशक अंत में संघ परिवार के दबाव में आ गया, माधव राव गोलवरकर और हेडगेवार के रक्त शुद्धता सिद्धांत के आगे रचनात्मकता टें बोल गई और अंत में ईसाई लड़की की शादी ईसाई दीपक तिजोरी से ही हुई. यहाँ तक कि अंत में हीरो को एक रिफ्यूजी पंजाबी चावला परिवार की लड़की से जबरिया सेट करा दिया गया. फिल्म को मेरी तरफ से पाँच तारा और एक चाँद भी.

बदकिस्मती से फिल्म फ्लॉप हो गई और इसका ठीकरा इस समीक्षा पर फूटा. रवीश जी ने आहत होकर पंजाब केसरी की नौकरी छोड़ दी. असल में वो अखबार था ही नहीं उनके लायक. उन्होंने कसम खाई कि आगे से फिल्मों के चक्कर में नहीं पड़ेंगे. काम की चीज़ सीखेंगे. फिर वो दस पंद्रह साल के लिए गायब हो गए. उनके इन सालों के बारे में किसी को कुछ ज्ञात नहीं है, लेकिन जब वो लौटे तो छा गए. 

रवीश जी आज बहुत बड़े स्टार हैं, उनकी क्रेडिबिलिटी आमिर शाहरुख से बहुत ज्यादा है. फिल्मी सितारों से चिपकने की उन्हें जरूरत भी नहीं है. इसलिए वो अपने कॉमेडी शो पर नई फिल्मों का प्रचार तक नहीं होने देते. बस बीच में दो एक मौके आए थे जब भारत पर दबाव बनाने के लिए आमिर शाहरुख के वाहियात बयानों पर प्रोग्राम चलाया गया था, मगर वो उनकी नौकरी की मजबूरी थी, वो एनडीटीवी गणराज्य के भारत में राजदूत जो ठहरे.

Via- Vikas Agrawal (@Vikasagrawal81)

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